संकीर्तन का आध्यात्मिक दृष्टिकोण
20th Dec 2025
लेख पढ़ें >
कर्म फल
22nd Feb 2025पूज्यपाद श्री स्वामी जी महाराज के अनुसार- ‘कर्म फल’
राम-नाम सब तीर्थ-स्थान, राम-राम जप परम-स्नान। धो कर पाप-ताप सब धूल, कर दे भय-भ्रम को उन्मूल ।।
प्रयागराज के महा मेले पर एक बार एक ऐसा महात्मा गया जो सर्व-शास्त्र-निष्णात था, जो सर्व-विधा-पारंगत था और जो ज्ञान से, सूर्य समान, प्रकाशमान था। जिज्ञासु जनों को उपदेश देते समय उसने बताया कि धर्म शास्त्र के अनुसार कर्म फल तीन प्रकार से भोगा जाता है-
■ एक तो जिस जन का, जिसने अपकार किया हो, जिस जन को जिसने सताया हो, समय पाकर, उससे वही बदला ले ले तो उस कर्म का फल भुगत जाता है।
■ दूसरे, राज दण्ड से कर्मों के फल भोग लिए जाते हैं।
■ तीसरे, राम के नियत नियम से प्राणी अपने कर्मों का परिणाम प्राप्त किया करता है।
परन्तु यदि कोई पाप-भीरु अपने किये दुष्कर्मों पर पूरा पश्चाताप करे और उनका यथा- विधि प्रायश्चित कर ले तो उसके दुष्कर्मों के कुसंस्कार, फल में न परिणत होकर, समूल नष्ट हो जाते हैं। यदि विवेकी मनुष्य अपनी दैनिक भूलों का, अपनी त्रुटियों का, अपनी असावधानताओं का, अपने प्रमादों का और कर्तव्यों के अतिक्रम, व्यतिक्रम का, प्रतिदिन, पश्चातापपूर्वक प्रायश्चित करता रहे तो उसके अन्तःकरण पर से पापों तथा दोषों की धूल धुलती रहती है। उसके चित्त की चादर, सदा चाँद सी चिट्टी चमका करती है।
प्रायश्चित, मानस रोगों की एक सिद्ध औषधि है। इससे मनुष्य का आध्यात्मिक स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है। यह पवित्र जीवन का पावन पथ है। अपने व्रतों को भंग कर देना तथा मर्यादा को लांघ जाना अतिक्रम कहा जाता है। विपरीत कर्म करना व्यतिक्रम कहाता है। इन दोषों को दूर करने का उपाय प्रायश्चित ही है। यह सच है कि पाप-पंक को धो देने का पवित्र गंगाजल, कुवासना के कांटे को, क्रिया के पैर से निकालने का सूक्ष्म शस्त्र और आत्म-शुद्धि का सुगम साधन, अनुपात सहित, प्रायश्चित करना ही माना गया है। [भक्ति-प्रकाश]
प्रेषक : श्रीराम शरणम्, रामसेवक संघ, ग्वालियर