संकीर्तन का आध्यात्मिक दृष्टिकोण
20th Dec 2025
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निरंजन, निराकार, सर्वाधार है-‘राम’
13th Sep 2025निरंजन, निराकार, सर्वाधार है-‘राम’
श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने श्रीमुख से वर्णन किया है- यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।।
अर्थात् देवताओं को पूजने वाले देवों को प्राप्त होते हैं। पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मुझे पूजने वाले मेरे भक्त, मुझे प्राप्त होते हैं। इसीलिए हम केवल उस सर्वशक्तिमान् परमात्मा श्री राम का ही आराधन करें तथा उसी के विश्वास की ज्योति जलायें।
पूज्यपाद श्रीस्वामी जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा है- ‘भगवान्नाम में सुदृढ़ विश्वास हो। कपड़े की रग-रग में जब तक रंग न जाय, रंग चढ़ता नहीं।’ इसी प्रकार हमारे रग-रग में राम-नाम का विश्वास दृढ़ हो। पूज्य श्रीस्वामी जी महाराज ने भक्ति-प्रकाश ग्रन्थ में राम-नाम में पूर्ण दृढ़ता रखने वाले भक्त प्रहलाद के मुख से कहलवाया है- टुक टुक करके काटिए, मेरा सर्व शरीर। तो भी तजूँ न राम को, होऊँ नहीं अधीर ।।
पूज्यपाद श्रीस्वामी जी महाराज की राम-नाम के प्रति अनन्य भक्ति तथा अखण्ड प्रेम हमें उनके ग्रन्थों अमृतवाणी तथा भक्ति-प्रकाश में दृष्टिगोचर होता है। उनके समस्त कार्य राममय ही होते थे। वे राम-नाम की पूजा, राम-नाम का ध्यान, राम-नाम का सिमरन तथा राम-नाम में संशयरहित सुदृढ़ विश्वास पर ही बल दिया करते थे।
पूज्यश्री स्वामी जी महाराज की हम साधकों को अमूल्य देन है- एक मंत्र, एक इष्ट, एक राम-नाम। राम-नाम की साधना में संलग्न रहते हुए हम आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हों। तभी हम स्वयं को पूज्यश्री स्वामी जी महाराज का सच्चा शिष्य कहलवाने के योग्य हो सकते हैं।
प्रेषक : श्रीराम शरणम् रामसेवक संघ, ग्वालियर