व्यास पूर्णिमा-विक्रम सम्वत् 2080

Shree Ram Sharnam Gwalior

श्री राम शरणम्

राम सेवक संघ, ग्वालियर

संकीर्तन का आध्यात्मिक दृष्टिकोण

20th Dec 2025

संकीर्तन का आध्यात्मिक दृष्टिकोण

पूज्यपाद श्री स्वामीजी महाराज का कथन है- जब आप भावना से आराधन, कीर्तन करते हैं, तो ईश्वर में लीन रहने वाले देवता भी आप के साथ सम्मिलित हो जाते हैं।
संकीर्तन भगवान का साक्षात् रूप है क्योंकि नाम और नामी में अभेद सम्बन्ध होने के कारण कीर्तन में उच्चारित नाम, प्रभु का साक्षात् स्वरूप बन जाता है। जिस प्रकार फूल से उसकी खुशबू को पृथक् नहीं किया जा सकता उसी प्रकार नाम से भी नामी को पृथक् करना असम्भव है। भगवान सच्चिदानन्दमय है अर्थात् वे ‘सत्’, ‘चित्’ एवं ‘आनन्द’ स्वरूप हैं। भगवान का नाम, रूप, गुण, प्रभाव व चरित्र और रहस्य का श्रद्धा और प्रेमपूर्वक उच्चारण करते-करते शरीर में रोमांच, कष्टावरोध, अश्रुपात, हृदय की प्रफुल्लता, मुग्धता आदि का होना ईश्वर के आनन्दांश का ग्रहण करना है। यह संकीर्तन न केवल कीर्तन करने वाले को पवित्र करता है वरन् जिसके कान में पहुँचता है उसे भी रस-सरिता में डुबो कर त्रितापों से मुक्त कर देता है।
अष्टांग योग का अभ्यासी क्रमशः यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार के बाद छठी सीढ़ी धारणा फिर ध्यान व समाधि पर पहुँचता है, किन्तु कीर्तन के स्वर लय के साथ श्वांस का संयोग प्राणायाम की सिद्धि प्राप्त करा देता है। नाम संकीर्तन से साधक का चित्त जब भगवान में लगता है तो प्रत्याहार व धारणा की सिद्धि सहज हो ही जाती है। संकीर्तन में अधिक तन्मयता, साधक को समाधि अवस्था में पहुँचा देती है। इसीलिए भगवान की प्राप्ति का सरल साधन नाम संकीर्तन ही है। पद्य प्र. 6/94/25 तथा आदि प्र. 19/35 में भगवान स्वयं नारद जी से कहते हैं :
नाहं वसामि बैकुण्ठे योगिनां हृदये न च । मद्भक्त यत्र गायत्री तत्र तिष्ठामि नारद ।।
नारद ! न मैं वैकुण्ठ में रहता हूँ, न योगियों के हृदय में, मैं तो वहीं रहता हूँ जहाँ मेरे भक्त मेरे गुण चरित्रों को गाते हैं, संकीर्तन करते हैं। अनेक भक्तों ने भी संकीर्तन के माध्यम से ही प्रभु प्राप्ति की है, जिनमें प्रमुख नारद, गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, मीरा, आचार्य शंकर, श्री गोरांङ्ग महाप्रभु को तो श्रीमद्भागवत में संकीर्तनावतार ही माना है।
– डॉ. श्रीमती सरिता सिंह
प्रेषक : श्रीरामशरणम्, रामसेवक संघ, ग्वालियर