संकीर्तन का आध्यात्मिक दृष्टिकोण
20th Dec 2025
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साधना-सत्संग जीवन में एक शुभ-संस्कार
19th Oct 2025साधना-सत्संग’ ग्वालियर में पूज्यपाद श्री स्वामी जी महाराज द्वारा 7 नवम्बर, 1959 को दिया गया प्रवचन
साधना-सत्संग जीवन में एक शुभ-संस्कार
साधना-सत्संग का अभिप्राय है- साधना करना। आसन आदि भी साधन है। किसी स्थान पर नियम-पूर्वक रहना भी साधना है। घर में रहते हुये यह विचार कम आता है कि समय का उपयोग किया जावे। यहां साधना-सत्संग में- हल्का खाना, जप अधिक करना, न किसी की निन्दा करना। यह बातें घर में कम होती हैं। इनको यदि घर में भी बरतें, तो उनकी जीवन में बड़ी उपयोगिता आती है।
साधना-सत्संग में भजन, पाठ, कीर्तन का लक्ष्य- अपने संस्कार अच्छे बनाना है। अन्तःकरण ऐसा हो जावे कि इसमें राम-नाम बसा हुआ हो और वह अपने आप स्फुरित हो। हमारे इन सत्संगों में बहुत लोग ऐसे है, जो बैठें तो नाम उनमें स्फुरित हो जाता है।
‘चिन्तामणि चित्त चिन्तन पूरक’ पाठ करने से चिन्ता दूर हो जाती है। यह एक विद्यार्थी ने मुझे लिखा। साधक मान-सम्मान आदि के भाव को हटाकर भक्ति-भाव से तालियाँ बजाये, तो उसमें भक्ति-भाव उछलने लगेगा। बाहरी बंधन ढीले करना चाहिये। फिर यह हो नहीं सकता कि उसमें कृपा अवतरित न हो।
औषध राम-नाम की खाइये, मृत्यु जन्म के रोग मिटाइये। औषधि में तो बल है, किन्तु यदि खान-पान में बहुत अधिक उल्लंघन किया जाये तो औषधि क्या करे ?
‘वहां तेरी कृपा होती है, जहां तेरा कीर्तन होता है, वहां मंगल होता है, वहां शुभ का संचार होता है।’ राम-नाम का जप जहां मुक्ति देता है, वहां परिवार तक के दुःखों का नाशक है। यह बात तो आप में दृढ़ता के साथ होनी चाहिये ।
[राम सेवक संघ, ग्वालियर के वरिष्ठ साधक की धरोहर से]
पूज्यपाद श्रीस्वामी जी महाराज द्वारा संस्थापित ‘रामसेवक संघ’ के नेतृत्व में श्रीराम शरणम्, श्री माधव सत्संग आश्रम, ग्वालियर में तीन-रात्रि साधना-सत्संग, 14 से 17 नवम्बर, 2025 तक लगाया जा रहा है।
प्रेषक : श्रीराम शरणम्, रामसेवक संघ, ग्वालियर