व्यास पूर्णिमा-विक्रम सम्वत् 2080

Shree Ram Sharnam Gwalior

श्री राम शरणम्

राम सेवक संघ, ग्वालियर

जीवन और साधना

14th Jun 2025

जीवन और साधना

प्रस्तुत प्रश्न है- ‘क्या जीवन और साधना में अन्तर है ?’ इसका एक मात्र उत्तर है- ‘नहीं, कोई अन्तर नहीं है।’ संक्षेप में स्पष्टीकरण इस प्रकार है-
सिद्ध ग्रन्थ अमृतवाणी में पूज्यपाद श्री स्वामी जी महाराज ने लिखा है- ‘जितने कर्तव्य-कर्म-कलाप, करिए राम-राम कर जाप।’ अर्थात् ‘कर्तव्य कर्म-कलाप’ को करते हुए राम-जाप करने का आदेश दिया है। यहाँ यह बात पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है कि श्री स्वामी जी महाराज हमें मुख से राम और हाथ से काम का अभ्यास करवाना चाहते हैं।
‘सोते जगते सब दिन-याम’ से यह बात और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है कि इस अभ्यास को वहाँ तक ले जाना चाहिए जहाँ ‘सपने में भी न बिसरे नाम।’ इसका अर्थ है कि नाम चेतना के समस्त स्तरों पर जाग्रत होकर उठना चाहिए जिसे हमारे गुरुजन आत्म-जागृति अथवा शक्ति-जागरण भी कहते हैं। इसमें भी आगे जब साधना बढ़ती है तो वह साँस-साँस नस-नस से रिसने लग जाती है।
क्या साँस लेना जीवित रहने की क्रिया से कोई भिन्न क्रिया है ? जिस प्रकार साँस लेना और जीवित रहना एक ही बात है उसी प्रकार जीवन और साधना भी एक ही वस्तु है। जो नस-नस से रिसने लग जाए, प्राणों में बस जाए, क्या वह केवल एक अभ्यास मात्र रह सकता है। जब तक सिमरन एक अभ्यास मात्र रहता है अर्थात् जब सिमरन किया तब तो साधना हुई शेष समय में नहीं, तो इससे स्पष्ट है कि सिमरन हमारे प्राणों में नहीं बसा। सिमरन जब जीवन बन जाता है तब क्षण-भर का विस्मरण अत्यन्त दारुण वेदना उत्पन्न करता है।
‘रहूँ मैं नाम में होकर लीन, जैसे जल में हो मीन अदीन’ इसमें पूज्यश्री स्वामी जी महाराज की फिलॉसफी पूर्णतः अंकित है। जैसे मीन (मछली) जल बिना जीवित नहीं रह सकती, जल उसका जीवन है और एक क्षण जल का बिछोह वह बर्दाश्त नहीं कर सकती, वैसे ही भक्त प्रभु का एक क्षण का भी विस्मरण सहन नहीं कर सकता। फिर जीवन और साधना में अन्तर कहाँ रहा ?
सिमरन राम-नाम है संगी, सखा -स्नेही सुहृद् शुभ अंगी।
(अमृतवाणी)
लघु ग्रंथ ‘उपासक का आन्तरिक जीवन’ में पूज्यपाद श्री स्वामी जी महाराज लिखते हैं- बार बार स्मरण करें ‘मैं अकेला नहीं हूँ। मेरा आराध्य देव मेरे अंग-संग हैं।’ अर्थात् अंग-संग मान लेने पर पूर्ण शरणागत व्यक्ति का ‘मैं, मेरा, अपना’ कुछ नहीं रहता। ‘तू और तेरा’ का भाव रह जाता है। इसे ही हम अखण्ड स्मृति कहते हैं।
अतः जीवन तथा साधना में अन्तर रहते, न तो जीवन, जीवन ही है और न ही साधना, साधना। साधना जीवन को दिशा देती है तो जीवन साधना को गति देता है। बिना दिशा के गति असम्भव है। यह वैज्ञानिक सत्य है।
प्रेषक : श्रीराम शरणम्, रामसेवक संघ, ग्वालियर