संकीर्तन का आध्यात्मिक दृष्टिकोण
20th Dec 2025
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पतित-पावन नाम है- ‘राम’ (1)
27th Jun 2025पतित-पावन नाम है- ‘राम’ (1)
राम-नाम को केवल पतित-पावन नहीं अपितु पावनों का भी पावन कहा गया है। परमेश्वर का पतित-पावन नाम है ‘राम’। इस राम-नाम को वाणी से जपना अथवा मन से जपना ‘सिमरन’ कहा जाता है।
- क्या अविधिपूर्वक धारण किया गया मन्त्र फलदायी है ?
- बिना किसी अनुभवी मनुष्य द्वारा लिया गया नाम (मन्त्र) फलीभूत हो सकता है ?
इसका उत्तर है- वेद-विहित तथा शास्त्र-सम्मत विधिपूर्वक किसी देहधारी अनुभवी मनुष्य द्वारा लिया गया परमेश्वर का मंगलमय नाम (मन्त्र) ही फलीभूत होता है। संक्षेप में स्पष्टीकरण इस प्रकार है- वाणी से अथवा मन से परमेश्वर के पतित-पावन नाम को जपने से या सिमरन करने से लाभ तो होता है किन्तु जिस प्रकार तस्वीर में लिखी हुई गाय को भी गाय ही कहा जाता है किन्तु उससे दूध भी प्राप्त नहीं होता और वह बछड़ा भी नहीं देती।
तब- ‘किन्तया क्रियते धेन्वा या न सृते न दुग्धदा।’ `उस गाय से क्या लाभ जो न बछड़ा जने और न दूध दे।’ इस प्रकार अपने आप प्रारम्भ कर दिए गये नाम सिमरन का भी कोई फल नहीं होता।
अतएव पूज्यपाद श्री स्वामी जी महाराज ने लिखा है-
‘यदि किसी अनुभवी मनुष्य द्वारा परमेश्वर का मंगलमय नाम लिया जाए, तो उससे अन्तरात्मा जग जाता है और वह नाम वृत्तियों को मूर्छित करने में एक मोहन मंत्र ही माना गया है।’ (भक्ति-प्रकाश, पेज क्र. 419)
इसी सन्दर्भ में प्रवचन पीयूष (पेज क्रमांक-15) पर अंकित है- `प्रश्न किया जाता है कि क्या इस मार्ग में व्यक्ति अपने आप चल सकता है? या किसी की सहायता की आवश्यकता होती है ? साधारणतया यह समझा जाता है कि किसी दूसरे की सहायता की आवश्यकता है, पर ऐसे भी व्यक्ति होते हैं, जो अपने आप ही चल कर लक्ष्य पर पहुंच जाते हैं, पर वे बहुत विरले होते हैं। इसलिये साधारण जनता के लिये सीखने का ही मार्ग है अर्थात् सिखाने वाले (Mentor) की आवश्यकता होती है।’
[विद्याभास्कर, कविरत्न, साहित्याचार्य, आदरणीय श्री अमीरचन्द शास्त्री जी द्वारा मासिक पत्रिका सत्य-साहित्य (1963) में वर्णित एक लेख से उद्धृत]
प्रेषक : श्रीराम शरणम्, रामसेवक संघ, ग्वालियर